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New Latest Shayri| न तो जीने की तम्मना थी?

 



Details: ऊपर दी गयी शायरी का सही-सही मतलब जान लेते हैं! कि इसमें शायर का मरने को लेकर कहे जाने वाले अलफ़ाज़ का सही मतलब क्या है।

 रोज़ एक नई तकलीफ
रोज़ एक नया गम

शायर: मैं अब नई नई तकलीफ़ और मुसीबतों से तंग आ गया हूँ। हर चीज़ की एक इंतिहा होती है कहाँ तलक सहूँ और कहाँ तलक बर्दाश्त करूँ। एक मुसीबत पीछा छोड़ती नही है कि दूसरी आन पड़ती है। 

कोई सुन सके हमें 
   यहाँ कोई ऐसा मौजूद नही है 
       खुदको महसूस नही कर पाता हूँ
जैसे खुदका कोई वजूद नही है 

आपको हाल-ए-दिल सुनाएं कैसे आप पर बीते तो पता चले
अब तो हर गम से जैसे
अपना रिश्ता सा है
     साथ दे रहा है कोई
जैसे कोई फ़रिश्ता सा है!

न जाने कब ऐलान होगा की मर गये हम

न तो जीने की तमन्ना थी और न मरने का इरादा है
अलफ़ाज़ हैं यह बस जीने का जो सहारा हैं
       दुनियां की मुहब्बत में क्यों आख़िरत को भूल जाऊँ
       ख़ुदकुशी है बुरी चीज़ इसपर कैसे झूल जाऊँ

 



ऊपर दी गयी शायरी उनके लिए है जो आज उदास हैं और उदास शायर की उदासी उसके लफ़्ज़ों में सुनने के लिए बेताब हैं तो

दिल थामकर बैठिएगा
कहीं यह दिल
खिसक न जाए आपका


शायर: लगता है जैसे मेरी कोई इज़्ज़त नही रह गयी है। अकेला हूँ कुछ भी महसूस नही करता हूँ । रात को उठ-उठ आहें भरता हूँ!

कोई जानने वाला नही है अपना हाल
जवाब दें क्या

पूछता जो नही है
कोई सवाल

 

   एक न एक दिन सबको
दुनिया छोड़कर चले जाना है

किसी की याद के इतने भूखे नही हम कि
दुनियां छोड़कर जाने का जो नाम लें 

यह तो बस............................
खुदको तसल्ली देने का एक बहाना है

Poet


खुदा को भूला बैठा
फानी-ए मौहब्बत में

काश! मैं इतना
ग़ाफ़िल न होता

न जलता आज यूँ आग में
काश!... मैं काफ़िर न होता।


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